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कब चेतेंगे हम ? हादसों के अतीत से कब लेंगे सबक ?

Posted On: 11 Apr, 2016 में

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यक्ष प्रश्न

कब चेतेंगे हम ? हादसों के अतीत से कब लेंगे सबक ? राजीव कुमार ओझा
कोल्लम जिले के पुत्तिंगल मंदिर परिसर में शताधिक श्रद्धालुओं की ह्रदय विदारक मौत,तकरीबन पांच सौ लोगों का जख्मी होना मंदिर प्रबंधन ,प्रशासनिक तंत्र और समाज की आत्मकेंद्रित मनोबृत्ति का नतीजा है ।
समाज ,प्रशासनिक अमला ,धर्म के ठेकेदारों ने यदि हादसों के अतीत से सबक लिया होता ,ऐसे हादसों की पुनराबृत्ति न हो इस पर गम्भीरता से चिंतन ,मंथन किया होता ,देश की संसद ,विधान मंडलों में सियासी नफा -नुकसान से ऊपर उठकर ठोस कानूनी प्राविधान (जिनमे ऐसे हादसों की जबाबदेही तय कर दण्डात्मक व्यवस्था की गई होती )तब बहुत संभव है की इस देश को बार बार ऐसे हादसों का दंश न झेलना होता।
किसी भी हादसे के बाद प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा करने की परंपरा रही है ।हादसों की आंच पर ,हादसों में मारे गए लोगों की लाशों पर सियासी रोटियां सेंकने का चलन है। आज का समाज तटस्थ भूमिका में है। क्योंकि समाज ने नौकरशाही और सियासी खलीफाओं की दूरभिसन्धि के तहत हस्तक्षेप की भूमिका से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं ,ईमानदारी की राह पर चलने की हिमाकत करने बाले पत्रकारों का हश्र देखा है जो समाज को तटस्थ रहने ,मूकदर्शक बने रहने का सन्देश देता है।
पुत्तिंगल मंदिर परिसर में मौत का ताण्डव भी हादसों के काले इतिहास में दर्ज हो जायेगा ।विविध प्रकार की ,विविध स्तरों की जांच की नौटंकी होगी और समय का मरहम इस जख्म को भी भर देगा। हम चुप्पी ओढ़ लेंगे अगले किसी हादसे तक के लिए।
क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है की हमारा आपदा प्रबंधन लचर है। आपदा का चेहरा चाहे आतंकी हमले का हो ,प्रकृति के कहर का हो या भीड़ प्रबंधन में नकारापन की कोख से उपजे पुत्तिंगल मंदिर परिसर हादसे का।
हैरत की बात है की वहां के जिलाधिकारी से मंदिर परिसर में आतिशबाजी पर रोक का लिखित अनुरोध एक वयोबृद्ध महिला पंकजाक्षी ने किया था। जिलाधिकारी ने कोरमपूर्ति के लिए कहें या जो हादसा हुआ इससे अपनी गर्दन बचाने के लिए रोक लगाई भी परन्तु धर्म के ठेकेदारों के संभावित कहर ,उनके प्रलाप के मनोवैज्ञानिक दबाब ने इस रोक पर सख्ती से अमल सुनिश्चित न होने दिया।
जहाँ अंधभक्तों की भीड़ का सैलाब उमड़ता हो वहां आतिशबाजी प्रतियोगिता होना ,अग्निशमन दल ,एम्बुलेंस जैसी एहतियाती व्यवस्था का अभाव मौत के इस भयावह तांडव की कहानी कहता है।
हमारी विधायिका ,कार्यपालिका ,न्यायपालिका ,शिक्षाविदों ,साहितय्कारों ,पत्रकारों ,सामाजिक कार्यकर्ताओं को मिल बैठकर ऐसे हादसों की पुनराबृत्ति रोकने के सबाल पर धर्म के ठेकेदारों के खौफ ,उनकी नाराजगी से होने बाले सियासी नफा नुकसान से ऊपर उठकर ठोस उपाय तलाशने या जैसा और जो कुछ अतीत में होता रहा है इस मामले में भी होने दिया जाये ? यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है।

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